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Thursday, January 15, 2026

यदि आँखें ठीक तो जहान अच्छा है : बच्चों को डिजीटल उपकरणों से रखें दूर : डॉ. डेम्ब्रा

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शहर के नेत्र विशेषज्ञों ने प्रेसवार्ता में आँखों की सेहत को लेकर साझा किये विचार

बच्चों को मोबाइल व डिजीटल उपकरणों से दूर रखने चलाया जायेगा जागरूकता अभियान  

रायगढ़ । नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर एसोसिएशन के बैनर तले शहर के जाने-माने डॉक्टर्स ने आज शहर के बालाजी मेट्रो हॉस्पिटल में एक प्रेसवार्ता आयोजित की, जिसमें आमजनों के अलावा विशेषकर बच्चों की आँखों की सेहत को लेकर उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए पत्रकारों से अपने विचार व सुझाव साझा किये। उन्होंने कहा कि पूरे प्रदेश में नेत्र विशेषज्ञों के द्वारा प्रेसवार्ता आयोजित कर मीडिया के माध्यम से अपने अभियान कि शुरुआत की जा रही है। इस अभियान में खासकर बच्चों की आँखों की सेहत को लेकर उनके अभिभावकों के आलावा स्कूलों के माध्यम से बच्चों को मोबाईल एवं अन्य डिजीटल उपकरणों का कम से कम उपयोग करने हेतु प्रेरित करने का कार्य किया जावेगा।

प्रेसवार्ता में उन्होंने बताया कि डिजिटल स्क्रीन (स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट) से निकलने वाली नीली रोशनी और लगातार देखना आपकी आंखों की मांसपेशियों पर जबरदस्त तनाव डालता है, जिसे डिजिटल आई स्ट्रेन कहते हैं। 20-20-20 नियम ही कुंजी है। हर 20 मिनट बाद, कम से कम 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी बस्तु को देखें। यह आंखों की फोकस करने वाली मांसपेशियों को आराम देता है।

जागरुक होकर पलकें झपकाएं स्क्रीन देखते समय हम सामान्य से 60% कम पलके झपकाते हैं, जिससे आँखें सूख जाती हैं। हर ब्रेक में जानबूझकर 10 बार पलकें झपकाएं ताकि आंखों में नमी बनी रहे। स्क्रीन आपकी आंखों के स्तर से थोड़ी नीचे (लगभग 20 डिग्री) होनी चाहिए और आपसे कम से कम 25 इंच (एक हाथ की दूरी) दूर होनी चाहिए। लैपटॉप को ऊपर उठाने के लिए स्टैंड का इस्तेमाल करें। ब्राइटनेस मेटिंग, स्क्रीन की ब्राइटनेस को कमरे की रोशनी के साथ संतुलित रखें। इसे ‘ऑटो-ब्राइटनेस’ मोड पर सेट करना सबसे अच्छा है। उन्होंने बताया प्राकृतिक धूप में समय बिताना मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) के बढ़ते खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

पराबैगनी सुरक्षा को गंभीरता से लें : धूप में बाहर निकलते समय हमेशा 100% सुरक्षा वाले धूप के चश्मे पहनें। सूरज की किरणें कॉर्निया और लेंस को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिससे बुढ़ापे में मोतियाबिंद का खतरा बढ़ जाता है। टोपी या कैप, विशेष रूप से दोपहर के समय, 50% तक यू वी एक्सपोजर को कम कर सकती है।

आंखों के पोषण के लिए सुपरफूड्स : आपकी डाइट सीधे तौर पर आपकी आंखों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। कुछ पोषक तत्व मैक्यूलर (रेटिना का केंद्र) को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक हैं। न्यूटिन और जियाजेंथिन ये ‘आँखों के विटामिन’ रेटिना को नीली रोशनी से बचाने वाले फ़िल्टर की तरह काम करते हैं। इसके लिए पालक, केल और अंडे खाएं। ओमेगा-3 फैटी एसिड, ये आंखों के सूखेपन को कम करने और रेटिना के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। अखरोट, चिया सीड्द्म, अलसी के बीज और फैटी फिश (जैसे सैल्मन) का सेवन करें।

विटामिन सी और ई, ये एंटीऑक्सीडेंट आंखों को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं। खट्टे फल (संतरा, नींबू), स्ट्रॉबेरी गाजर, और बादाम अपनी डाइट में शामिल करें। शरीर में पर्याप्त पानी (हाइड्रेशन) आंखों के आंसू के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है, जो सूखापन और जलन को रोकता है।

स्वच्छता और संपर्क लेंस सुरक्षा : आंखों के संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छता पहली प्राथमिकता है। आंखें रगड़ने से बचें। खुजली होने पर आखों को रगड़ने से कॉर्निया को नुकसान हो सकता है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कॉन्टैक्ट लेंस में लापरवाही न करें। लेंस पहनने वाले टीनएजर्स को सख्त सफाई नियमों का पालन करना चाहिए। लेंस को गंदे हाथों से छूना, या लेंस पहनकर सोना, गंभीर आई इन्फेक्शन (जैसे कॉर्नियल अल्सर) का कारण बन सकता है, जिससे स्थायी दृष्टि हानि हो सकती है।

नियमित जांच और सुरक्षा : नियमित नेत्र जांच केबल नंबर बदलने के लिए नहीं होती, बल्कि यह आंखों की गंभीर बीमारियों का पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका है। भले ही आपको चश्मे की जरूरत न हो, लेकिन हर साल एक नेत्र विशेषज्ञ से विस्तृत जांच कराएं। कई समस्याएं (जैसे ग्लूकोमा) शुरुआत में कोई लक्षण नहीं दिखाती हैं। किसी भी लक्षण को नज़रअंदाज़ न करें, लगातार सिरदर्द, आंखों में लाली, बहुत ज्यादा पानी आना, या अचानक धुंधला दिखना- ये सब चेतावनी के संकेत हैं जिन पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल या अन्य तेज़ गति वाले खेलों में आंखों की चोट का खतरा होता है। ऐसे खेलों में हमेशा उचित फिटिंग वाले सुरक्षात्मक चश्मे का उपयोग करें।

पालकों के लिए निर्देश : 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को मोबाइल तथा लेपटॉप देखने ना दें। 16 वर्ष तक के बच्चों को केवल 2-3 घंटे ही स्क्रीन एक्सपोज़र हो। सामूहिक तौर पर टी बी 4 वर्ष की आयु से 1 घंटा देखा जा सकेगा। प्रतिवर्ष आधा घंटा समय बढ़ाते जाये। सोशल मीडिया 16 वर्ष के पहले देखने की अनुमति न हो।

शिक्षकों के लिए आवश्यक सुझाव : किसी भी छात्र / छात्रा को प्रोजेक्ट वर्क या होमवर्क मोबाइल पर अथवा डिजिटली न देवें। ऐसे में किशोरावस्था में ही बच्चों को मोबाइल चलाने लत लग सकती है। प्रत्येक स्कूली छात्र / छात्रा को क्लासरूम में रोटेशन से अग्रिम पंक्ति से पीछे की पंक्ति में बिठाया जाना अनिवार्य है, ताकि मायोपिया रोग का शीघ्र निदान स्वयं शिक्षक ही क्लासरूम में कर सकते है। फिर नेत्रविशेषज्ञ द्वारा अभिभावक की उपस्थिति में नेत्र परीक्षण कर चश्मे प्रदान किये जाते है। इन दिशानिर्देशों का पालन करके हम अपनी आंखों को स्वस्थ, सुरक्षित और उनकी दृष्टि की शक्ति को आने वाले वर्षों तक बरकरार रख सकते हैं।

आज की प्रेसवार्ता में एसोसिएशन की ओर से डॉ. डेम्बरा, डॉ. सलोनी अग्रवाल, डॉ. प्रीति सिंह, मेडिकल कॉलेज, डॉ. प्रभात पटेल मेट्रो हॉस्पिटल, डॉ. शिव नायक सिद्धेश्वर नेत्रालय, आदि उपस्थित थे।

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